कोकिला व्रत : जानिए कोकिला व्रत की कथा और महत्व !!!!

कोकिला व्रत रखने का विधान आषाढ़ मॉस की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी से लेकर सावन मॉस की पूर्णिमा तक है। इस व्रत में माँ भगवती की कोयल रूप में पूजा की जाती है। महिलाओ को इस व्रत के रखने से सकारत्रय सूत , सौभाग्य तथा सम्पदा की प्राप्ति होती है। यह पर्व ज़्यादातर दक्षिण भारत में मनाया जाता है। आइये जानते है इस व्रत की कथा और महत्व :-
कोकिला व्रत का महत्व :
कोकिला व्रत को रखने की ऐसी मान्यता है की इस व्रत को रखने से सभी सुखो की प्राप्ति संभव होती है। दाम्पत्य जीवन को खुशहाल होने का वरदान प्रदान करता है यह व्रत। कोकिला व्रत को रखने से मन के अनुरूप शुभ फल की भी प्राप्ति होती है। अगर शादी में दिक्कत आरही है तो इस व्रत को रखने से विवाह का सुख प्राप्त हो सकता है। यह व्रत सहायक बनता है योग्य वर की प्राप्त करने के लिए।

कोकिला व्रत की कथा :
शिव पुराण में प्राप्त होता है कोकिला व्रत की कहानी का सम्बन्ध। कोकिला व्रत की कथा इस प्रकार है ब्रह्मा के मानस पुत्र दक्ष के घर देवी सती का जन्म होता है। दक्ष विष्णु भगवान् का भक्त था तथा भगवान् शिव से यह द्वेष रखता था। जब देवी सती के विवाह की बात होती थी तब कभी भी राजा दक्ष देवी सती का संबंध भगवान् शिव के साथ करना नहीं चाहते थे। परन्तु राजा दक्ष के मना करने के बाद भी देवी सती ने भगवान् शिव से विवाह कर लिया। देवी सती के इस कार्य से दक्ष इतना क्रोधित होते है की वह देवी से सम्बन्ध तोड़ लेते है। कुछ समय पश्चाद राजा दक्ष भगवान् शिव को अपमानित करने के लिए महायज्ञ का आयोजन कराते है। उसमे राजा दक्ष अपनी पुत्री सती और भगवान् शिव को आमंत्रित नहीं करते है। जब भगवान् शिव को इस महायज्ञ का कारन पता चलता है तब वह दक्ष और उसके यज्ञ को नष्ट कर देते है। परन्तु शिव सती के वियोग को नहीं सह पाते है और शिव के विरुद्ध जाकर यज्ञ में प्राणो को त्यागने पर उन्हें हज़ाए वर्ष तक कोयल बनने का श्राप देते है। देवी सती भगवान् शिव को पाने के लिए पुनः पाने का प्रयास करती है। उनकी तपस्या का फल उन्हें देवी पार्वती रूप में शिव की प्राप्ति के रूप में मिलता है। उस समय से कोकिला व्रत की महत्ता चालू हुई थी।