जानिये एक ऐसा अनोखा मँदिर जहां पर चुहो का झूठा प्रसाद भक्तों को दिया जाता है!!

वैसे तो मूषक गणेश जी की सवारी हैं जिसके कारण हम इनमें अपनी श्रद्धा जता सकते हैं। लेकिन आमतौर पर घर से लेकर खेत तक में चूहों द्वारा किए उत्पात से परेशान लोग चूहों को अशुभ ही मानते हैं। यहां तक कि प्लेग जैसी भंयकर बिमारी फैलने का कारण भी चूहे ही बताये गये थे। ऐसे में क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी मंदिर में चूहों की पूजा की जाती होगी, वो भी एक या दो नहीं पूरे 20 हजार चूहों की। जी हां !! बीस हजार चूहे,इसके साथ-साथ हमारे घर से चूहों के रहने के कारण बदबू भी आने लगती गै। लेकिन आप जानते है कि माता का यह एक ऐसा मंदिर है। जहां पर सैकड़ों चूहें रहते है। और इनके रहने से कोई बदबू नहीं फैलती और न ही कोई बीमारी।

करणी माता मंदिर
करणी माता मंदिर

राजस्थान के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलो मीटर दूर देशनोक में स्थित करणी माता का मंदिर जिसे चूहों वाली माता, चूहों वाला मंदिर और मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि मां दुर्गा का साक्षात अवतार-करणी माता है।

इस मंदिर में आपको कालें रंग के चूहे नजर आएगे, लेकिन जिसे सफेद रंग का चूहा नजर आएगा। समझो उसकी हर मनोकामना पूर्ण हो गई। इतना ही नहीं इस चूहे को देखने के लिए यहां पर भक्तों की काफी होड़ लगती है। इस मंदिर में साल के दोनो नवरात्र में अच्छी खासी भीड़ होती है और माता के मंदिर को सजाकर उत्सव भी मनाया जाता है।

करणी माता मंदिर
करणी माता मंदिर

यह हैं करणी माता के पीछे की कहानी
इस मंदिर के बारें में कथा है कि करणी माता का जन्म सन् 1387 में एक चारण परिवार में हुआ था। उनका बचपन का नाम रिघुबाई था। रिघुबाई की शादी साठिका गांव के किपोजी चारण से हुई थी लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उनका मन सांसारिक जीवन से ऊब गया इसलिए उन्होंने किपोजी चारण की शादी अपनी छोटी बहन गुलाब से करवाकर खुद को माता की भक्ति और लोगों की सेवा में लगा दिया।

कहा जाता है कि करणी माता 151 साल तक जिंदा रही और 23 मार्च 1538 को ज्योतिर्लिन हुई थी। उनके ज्योतिर्लिन होने के बाद उनके भक्तों ने उनकी मूर्ति की स्थापना कर के उनकी पूजा शुरू कर दी जो की तब से आज भी चली आ रही है।

मूषकों का झुण्ड
करणी माता बीकानेर राजघराने की कुलदेवी है। कहा जाता है कि इनके आशीर्वाद से ही बीकानेर और जोधपुर रियासत की स्थापना हुई थी। करणी माता के वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर रियासत के महाराजा गंगा सिंह ने 20वीं शताब्दी के शुरुआत में करवाया था।
इस मंदिर में चूहों के अलावा, संगमरमर के मुख्य द्वार पर की गई उत्कृष्ट कारीगरी, मुख्य द्वार पर लगे चांदी के बड़े-बड़े दरवाजे, माता के सोने के छत्र और चूहों के प्रसाद के लिए रखी चांदी की बहुत बड़ी परात भी मुख्य आकर्षण है।

यहां पर सिर्फ चूहों का शासन
इस मंदिर में प्रवेश करते ही आपको हर जगह चीजें नजर आएगें। इतना ही नही यह आपके शरीर में भी उछल-कूद करेगे। जिसके कारण यहां पर आपको अपने पैर घसीटते हुए जाना पडता है। जिससे कि कोई चूहा घायल न हो। अगर आपने पैर उठाया और आपके पैर से कोई चूहा घायल हुआ तो यह अशुभ माना जाता है।

मूषकों का झुण्ड
मूषकों का झुण्ड

यहां पर कम से कम 20000 चूहे रहते है। और इन चूहों में कुछ सफेद चूहे रहते है जो कि बहुत ही पवित्र माने जाता है। मान्यता है की यदि आपको सफ़ेद चूहा दिखाई दे गया तो आपकी मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी।

दिया जाता है भक्तों को स्पेशल प्रसाद
इस मंदिर में रहने वाले चूहों की अपनी ही एक विशेषता है। इस मंदिर में सुबह 5 बजें मंगल आरती और शाम को 7 बजे आरती करते समय सभी चूहें अपने बिल से बाहर आ जाते है। यहां पर रहने वाले चूहों को काबा कहा जाता कहां जाता है।
मां को जो प्रसाद चढाया जाता है वो पहले चूहे खाते है। उसके बाद उसे भक्तों के बीच बांटा जाता है। इस चूहों की चील, गिद्ध और दूसरे जानवरो से रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानो पर बारीक जाली लगी हुई है।

मूषकों का झुण्ड
मूषकों का झुण्ड

यह चूहे है माता की संतान
मन्याता है कि इस मंदिर में जो भी चूहे रहते है वो माता के संतान है। इनकी एक कथा के अनुसार एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र लक्ष्मण, कोलायत में स्थित कपिल सरोवर में पानी पीने की कोशिश में डूब कर मर गया। जब करणी माता को यह पता चला तो उन्होंने, मृत्यु के देवता यम को उसे पुनः जीवित करने की प्रार्थना की। पहले तो यम राज़ ने मन किया पर बाद में उन्होंने विवश होकर उसे चूहे के रूप में पुर्नजीवित कर दिया।

5 Comments