कर्ण ने कुरुक्षेत्र में कैसे की धनुर्धारि अर्जुन के जीवन की रक्षा; अद्भुत रहस्य ..!!!

भारतीय पौराणिक कथाएं(Indian Mythological Story)

आज हम बात करेंगे महाभारत(Mahabharat) की एक अनसुनी और अनोखी कथा के बारे में । इस कथा को पढ़कर आप जानेगें की अधर्म का मार्ग अपनाने के बावजूद कर्ण में नैतिकता थी ।

महायोद्धा कर्ण
महायोद्धा कर्ण

महाभारत का युद्ध अपनी चरम सीमा पर था । ऐसे में भगवान(Bhagwan) श्री कृष्ण(Krishna) हर समय यह प्रयास करने की कोशिश करते । युद्ध में कहीं अर्जुन(Arjun) और कर्ण(karan) का एक दूसरे से सामना ना हो जाए।

पौराणिक कथा (Mythological Story)

एक बार कुरुक्षेत्र(Kurukshetra) में दोनों का एक दूसरे से सामना हो ही गया। दोनों एक दूसरे पर तीरों की वर्षा करने लगे । कर्ण(karan) अब अर्जुन(Arjun) पर हावी होने लगे थे ।उन्होंने अर्जुन(Arjun) पर अनेक तेज बाणों से प्रहार करना शुरू किया। जब एक भयंकर आघात अर्जुन(Arjun) पर आया तो श्री कृष्ण स्थिति को भाप गए और उन्होंने अपना रथ नीचे कर दिया।

महाभारत का युद्ध

कर्ण(karan) का वह बाण अर्जुन(Arjun) के मुकुट के ऊपरी हिस्से को काटता हुआ निकला । आश्चर्य की बात तो यह थी की वह बाण वापस उनके तरकस में आ गया तथा क्रोधित होकर तर्क-वितर्क करने लगा । बोला अबकी बार जब तुम अर्जुन(Arjun) पर निशाना साधो तो ध्यान रहे कि निशाना अचूक होना चाहिए ।

अगर में लक्ष्य पर लग गया तो हर हाल में अर्जुन(Arjun) मृत्यु को पा जाएगा । उसकी रक्षा किसी भी हालत में नहीं हो सकती । इस बार पूरा प्रयत्न करो तुम्हारी प्रतिज्ञा अवश्य ही पूर्ण होगी ।

कर्ण अर्जुन युद्ध
कर्ण अर्जुन युद्ध

कर्ण(karan) ने जब यह सुना तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने उस बाण से उसका परिचय पूछा की आपको अर्जुन(Arjun) के वध को लेकर इतनी प्रबल इच्छा क्यों है । उनके यह पूछने पर उस बाण में से एक सर्प प्रकट हुआ।  वास्तविकता में उस बाण में एक सर्प का वास था। सर्प(Snake) बने बाण ने अपना परिचय देते हुए कर्ण(karan) से कहा, मैं महासर्प अश्वसेन हूँ । अर्जुन(Arjun) से प्रतिशोध लेने के लिए मेने बहुत लम्बी साधना और प्रतीक्षा कर रखी है। इसलिए आज मैं तुम्हारी तरकश में हूँ एक तुम ही हो जिसमे उससे समाना करने का सामर्थ्य है।

कर्ण से जुडी पौराणिक कथा (Mythological Story)

अर्जुन(Arjun) ने एक बार खांडव वन में आग लगा दी थी । आग इतनी प्रचण्ड थी कि उस आग ने वन में सब कुछ जलाकर राख कर दिया था। उस वन में मैं अपने परिवार के साथ रहता था । उस प्रचण्ड अग्नि(Agni) ने मेरे पूरे परिवार को जला दिया । मैं उनकी रक्षा नहीं कर पाया । इसके प्रतिशोध के लिए मेने बहुत लम्बी प्रतीक्षा की है ।

अर्जुन के द्वारा कर्ण का वध
अर्जुन के द्वारा कर्ण का वध

तुम सिर्फ ऐसा करो कि मुझे अर्जुन (Arjun) के शरीर तक पहुंचा दो इसके आगे का शेष कार्य मेरा घातक विष कर देगा ।कर्ण (karan) ने उस सर्प से कहा मित्र(friend) मैं आपकी भावनाओ का सम्मान करता हूँ । परन्तु मैं यह युद्ध (yudh) अपने पुरुषार्थ व नैतिकता के रास्ते पर चलकर जीतना चाहता हूँ ।

और ऐसे बचाई कर्ण(karan) ने अर्जुन(Arjun) की जान।