जगन्नाथ पूरी रथयात्रा : जानिए रथयात्रा का इतिहास !!!

उड़ीसा के पूरी में निभाई जाती है भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा की परंपरा। पूरी में परम्पराओ का इतिहास जगन्नाथ की रथयात्रा के बिना अधूरा है। रथयात्रा के इतिहास के मूल में मुख्य देवता भगवान् जगन्नाथ ही है। वैष्णव धर्म की मान्यता है की भगवान श्री कृष्ण और राधा की युगल मूर्ति के प्रतिक भागवान जगन्नाथ ही है। इसी प्रतिक के रूप भागवान जगन्नाथ जी से सम्पूर्ण जगत का प्रारम्भ हुआ था। श्री कृष्ण भागवान जगन्नाथ की कला का एक रूप है।

हिन्दू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चारो धामों को एक युग का प्रतिक माना जाता है । इस प्रकार से कलियुग का पवित्र धाम जगन्नाथपूरी माना जाता है। यह धाम भारत के पूर्व में उड़ीसा राज्य में स्तिथ है। जगन्नाथपूरी के प्राचीन नाम पुरुषोत्तम पूरी , नीलांचल , शंख और श्रीक्षेत्र है।

उड़ीसा क्षेत्र के प्रमुख देवता जगन्नाथ है। ऐसा माना जाता है की भागवान जगन्नाथ की प्रतिमा राधा और भागवान श्री कृष्ण का युगल स्वरुप हैं। भागवान जगन्नाथ के अंश रूप श्री कृष्ण ही है। यही कारन है की भागवान जगन्नाथ को पूर्ण ईश्वर माना गया है।

जगन्नाथ जी की रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीय से आरम्भ होती है। यह यात्रा मुख्या मंदिर से प्रारम्भ होकर 2 किलोमीटर दूर स्तिथ गुंडिचा मंदिर पर समाप्त होती है। इस मंदिर में जगन्नाथ सात दिन तक विश्राम करते है तथा आषाढ़ शुक्ल दशमी के दिन फिर से वापसी यात्रा होती है और फिर मुख्या मंदिर पहुँचती है।
ऐसा माना जाता है की इस रथयात्रा के शिखर दर्शन से ही मनुष्य जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। स्कन्द पुराण में बताया गया है की आषाढ़ मॉस में पूरी तीर्थ में स्नान करने से सभी तीर्थो के दर्शन का पुण्य फल मिलता हैं और उस भक्त को शिवलोक की प्राप्ति होती है।