पढ़िए भगवान शिव के अलग-अलग रूप और उनके विभिन्न नामों की महिमा, भाग-1…!!!

भगवान शिव से जुड़ी कथा (Stories of Lord Shiv)

भगवान शिव के अलग-अलग रूप है।

हमारे हिन्दू शास्त्रों में भगवान शिव (Shiv) को जगत का संहारक माना गया है उनकी लीलाओं की तरह शिव (Shiv) की महिमा भी अपरंपार है।

हमारे पुराणों में भोलेनाथ (Bholenath) को कई नामों से पुकारा गया है,

 

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

आपको बता दें यह नाम ऐसे ही नहीं रखें गए है बल्कि इनका संबंध किसी न किसी घटना से जुड़ा हुआ है।

आइये जानते है भगवान् शिव (Shiv) के अलग-अलग नामों को और साथ ही जानेंगे उनके पीछे की कहानी भी:

शिव

अक्सर हम ‘शिव’ कहकर बुलाते है भोलेनाथ को

जो समस्त कल्याणों के निधान हैं

और भक्तों के समस्त पाप और त्रिताप का नाश करने में सदैव समर्थ हैं, उनको ‘शिव’ कहते हैं।

इसलिए भोलेनाथ (Bholenath) को शिव (Shiv) कहा गया है।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

पशुपति

शास्त्रों में कहते है ज्ञान शून्य अवस्था में सभी पशु माने गए हैं।

और दूसरे जो सबको अविशेष रूप में देखते हों, वे भी पशु कहलाते हैं।

अतः कहा जाए तो ब्रह्मा से लेकर सभी पशु माने जाते हैं और शिव सबको ज्ञान देने वाले तथा उनको अज्ञान से बचाने वाले हैं, इसलिए वह पशुपति (Pashupati) कहलाते हैं।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप

मृत्युंजय

मृत्यु एक परम सत्य है जिसे कोई जीत नहीं सकता।

स्वयं ब्रह्मा (Brahma) भी युगातं में मृत्यु कन्या के द्वारा ब्रह्म में लीन होने पर शिव (Shiv) का एक बार निर्गुण में लय होता है, अन्यथा अनेक बार मृत्यु की ही पराजय होती है।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

कहा जाता है चूँकि समुन्द्र मंथन के दौरान शिव ने देव रक्षा के लिए विष का पान कर मृत्यु पर विजय प्राप्त की, इसलिए वह ‘मृत्युजंय’ कहलाते हैं।

त्रिनेत्र
अक्सर आपने शंकर जी को त्रिनेत्र कहलाते हुए सुना होगा दरअसल एक बार भगवान शिव (Shiv) शांत रूप में बैठे हुए थे।

उसी अवसर में हिमद्रितनया भगवती पार्वती (Parwati) ने विनोद वश होकर पीछे से उनके दोनों नेत्र मूंद लिए।

शिव के नेत्र चंद्र और सूर्य थे।

ऐसे नेत्रों के बंद होते ही विश्व भर में अंधकार छा गया और संसार में हाहाकार मच गया ।

भगवान शिव के अलग-अलग रूप
भगवान शिव के अलग-अलग रूप

तब शिव (Shiv) जी के ललाट से युगांतकालीन अग्नि स्वरूप तीसरा नेत्र प्रकट हुआ।

उसके प्रकट होते ही दसों दिशाएं प्रकाशित हो गई।

अंधकार हट गया और हिमालय जैसे पर्वत भी जलने लग गए।

यह देखकर जैसे पर्वत भी जलने लग गए। यह देखकर पार्वती (Parwati) घबरा गई और हाथ जोड़ कर स्तुति करने लगीं।

तब शिव जी प्रसन्न हुए और उन्होंने संसार की परिस्थिति यथापूर्व बना दी।

तभी से वे ‘चंद्रार्काग्नि विलोचन’ अर्थात् ‘त्रिनेत्र’ कहलाने लगे।

 

परम पिता परमेश्वर आप सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें ।

॥ जय महाकाल ॥

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