एक ऐसा मँदिर जहां बेहति है घी की नदी !!!

यह बात हमने कई बार अपने माता पिता से सुनी है की भारत एक समय में सोने की चिड़िया था और यहाँ पर दूध-घी की नदियां बहा करती थी। मगर हमने कभी यह देखा नहीं है मगर आज हम आपको एक ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे है जहाँ आज भी एसा  होता है।यहाँ आज भी घी की नदी बहती है चलिए इस गांव के बारे में आपको बताते है। गुजरात को सदैव से एक समृद्ध राज्य माना गया है यही पर रूपाल गांव है जहां ‘श्री वरदायिनी माता’ के नाम से विख्यात श्री ब्राह्मणी माताजी का मंदिर है। नवरात्र के समय में यहाँ 10 दिन तक पल्ली उत्सव मनाया जाता है जिसमें माता के ऊपर घी चढ़ाया जाता है। देश विदेश से श्रद्धालु यहाँ आते है जिस से यहाँ पर मेला सा लग जाता है।

मंदिर जहाँ बहती है घी की नदी
मंदिर जहाँ बहती है घी की नदी

हर साल यहाँ इतना घी चढ़ाया जाता है कि गाँव में घुटनों-घुटनों तक घी बहने लगता है। जब यह घी गाँव की गलियों में छोटी-सी नहर का रूप ले लेता है तो वाल्मीक‍ि समाज के लोग घी जमा करने लगते हैं। शास्त्रों के विधान के अनुसार केवल यही लोग यहाँ घी जमा कर सकते हैं। घी जमा करने के बाद ये लोग उसे साफ करते हैं फिर इसी घी से मिठाइयाँ बनाई जाती हैं या फिर इस घी का बाजार में विक्रय कर दिया जाता है। आप सोच रहे होंगे की पल्ली का क्या मतलब होता है तो आपको बता दें की यह एक प्रकार का लकड़ी का ढांचा होता है जिसमें पांच जोत होती है जिससे माता का अभिषेक किया जाता है। यह पल्ली गांव के चौराहों पर ले जाई जाती है जहाँ लोग घी के साथ तैयार रहते है जिसकी मात्र लाखों लीटर में होती है। यह घी जमीन पर गिरा कर अर्पित किया जाता है जिसे बाद में भर के प्रसाद के रूप में साल भर इस्तेमाल किया जाता है।यहाँ के घी की खासियत यह है की कोई भी जानवर इसे नहीं चाटता और इसका कपड़ों पर भी निशान नहीं पड़ता है। यहाँ मांगी गयी हर मुराद पूरी होती है।

श्री वरदायिनी माता
श्री वरदायिनी माता

प्राचीन कथा-

ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ वनवास के दरमियान रूपाल गाँव से निकले थे, तब माता वरदायिनी की आराधना करके एक साल के गुप्तवास के दरमियान पकड़े न जाएँ, इसलिए मानता मानीथी। एक साल बाद मानता पूर्ण होते ही पांडवों ने सोने की पल्ली बनवाकर, उस पर शुद्ध घी चढ़ाकर पूरे गाँव में पल्ली यात्रा निकाली थी। तब से शुरू हुई यह परंपरा आज तक जीवंत है। इस रथ को सभी वाणंगभाई सजाते और कुम्हार लोग मिट्टी के पाँच कुंड बनाकर पल्ली यात्रा पर रखते हैं।

श्री वरदायिनी माता
श्री वरदायिनी माता

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