आखिर कहां जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियां; धार्मिक और वैज्ञानिक पहलु…!!!

मां गंगा के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है। शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है इसलिए पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है।

पवित्र गंगा
पवित्र गंगा

गंगाजल को सबसे पवित्र माना गया है। हमारे हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद अस्थिकलश को गंगा में विसर्जित करना एक धार्मिक मान्यता है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है जब अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाता है तो यह अस्थियां जाती कहां हैं? असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है ऐसा क्यों ।

पतितपावनी गंगा
पतितपावनी गंगा

तो आइए आज अस्थिकलश को गंगा में प्रवाहित करने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण को जानते हैं।

मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है। यह सोचकर एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और बोली, हे देव! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं। हे देव मैं कैसे इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी कृपा कर मेरा मार्दर्शन करें ?

पतितपावनी
पतितपावनी

यह सुनकर श्री हरि बोले हे देवी गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आकर आप में स्नान करेंगे तो ये सभी पाप धुल जाएंगे, और आप सदैव पवित्र ही रहेंगी। मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थियां को गंगा में विसर्जन किया जाता है। ऐसा करने से व्यक्ति के प्राण श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्सियम और फास्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। क्यूंकि हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है, इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मर्करी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं।

गंगा में अस्ति विसर्जन
गंगा में अस्ति विसर्जन

हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततः शिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।

 

॥ हर हर गंगे ॥

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