पित्र पक्ष : आखिर क्यों पितृयान से गए पितर वापस लौट जाते हैं, जानिए देवयान का रहस्य!!

गति बहुत ही महत्वपूर्ण है। गति होती है ध्वनि कंपन तथा कर्म से। यह दोनों स्थिति चित्त का हिस्सा बन जाती है। कर्म, विचार तथा भावनाएं भी एक गति ही है, जिससे चित्त की वृत्तियां निर्मित होती है। योग के मुताबीक चित्त की वृत्तियों से मुक्ति होकर स्थिर हो जाना ही मोक्ष है। परंतु यह चित्त को स्थिर करना आम लोगों के बस की बात नहीं। ऐसे में वे जब देह छोड़ते हैं तो अपने कर्म के मुताबिक गति करते हैं।

 मरने के बाद आत्मा की तीन तरह की गतियां रहती हैं- 1. उर्ध्व गति, स्थिर गति तथा अधोगति। इसे ही अगति तथा गति में विभाजित किया गया है। अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता,और उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है। अगति के चार प्रकार होते है-क्षिणोदर्क, भूमोदर्क,अगति तथा दुर्गति। क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्यु लोक में आता है तथा संतों सा जीवन जीता है। भूमोदर्क में वह सुखी तथा ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है। गति में वह नीच या पशु जीवन में चला जाता है। गति में वह कीट, कीड़ों भी जैसा जीवन पाता है।

इसी तरह गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है। गति के अंतर्गत चार लोक दिए गए हैं: ब्रह्मलोक, देवलोक, पितृलोक एवं नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के मुताबिक उक्त लोकों में जाता है। ब्रह्मलोक वह पहुंचता है जिसने योग तथा ध्यान करके मोक्ष प्राप्त किया है। देवलोक पुण्‍यात्मा ही पहुंच पाती है। कुछ काल रहने के बाद उसे पुन: मनुष्‍य योनि में जन्म लेना पड़ता है। पितृलोक में भी पुण्‍यात्मा ही पहुंच पाती है जहां वह अपने पितरों के साथ सुखपूर्वक समय बिताकर पुन: जन्म लेती है। नर्कलोक में पापी या दुष्‍कर्मी आत्माएं का ही जन्म होता है।वह भी यहां कुछ काल रहने के बाद पुन: किसी भी योनि में जन्म ले लेती है।

पुराणों के अनुसार आत्मा तीन मार्ग के द्वारा उर्ध्व (उर्ध्व गति) या अधोलोक (अधोगति) की यात्रा करती है। ये तीन मार्ग होते है- अर्चि मार्ग, धूम मार्ग एवं उत्पत्ति-विनाश मार्ग। अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक तथा देवलोक की यात्रा के लिए है। धूममार्ग पितृलोक की यात्रा के लिए है। उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्राओ के लिए है। यह यात्रा बुरे सपनों की जैसी होती है। जब भी कोई मनुष्य मरता है तथा आत्मा शरीर को त्याग कर उत्तर कार्यों के बाद यात्रा प्रारंभ करती है तो उसे उपरोक्त तीन मार्ग मिलते हैं। उसके कर्मों के मुताबिक उसे कोई एक मार्ग यात्रा के लिए प्राप्त हो जाता है।

शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।

एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ॥

अर्थ : क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के- शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान तथा पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 24 के मुताबिक अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।)- जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता है, उस परमगति को प्राप्त होता है तथा दूसरे के द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी।) फिर वापस आता है अर्थात्‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है॥

 
देवयान तथा पितृयान : सबसे पहला जन्म साधारण जन्म है। पिता की मृत्यु के उपरांत पुत्र में तथा पुत्र के बाद पौत्र में जीवन की जो निरंतरता बनी रहती है उसे दूसरे प्रकार का जन्म माना गाया है। मृत्युपरांत पुनर्जन्म तीसरे प्रकार का जन्म होता है।

कौशीतकी में ऐसे व्यक्तियों का उल्लेख मिलता है जो मृत्यु के पश्चात् चंद्रलोक में जाते हैं और अपने कार्य एवं ज्ञानानुसार वर्षा के माध्यम से पृथ्वी पर कीट पशु, पक्षी अथवा मानव रूप में जन्म लेते हैं। अन्य मृतक अग्निलोक में देवयान द्वारा चले जाते हैं।

छांदोग्य के मुताबिक ज्ञानोपार्जन करने वाले भले व्यक्ति मृत्युपरांत देवयान द्वारा सर्वोच्च पद प्राप्त करते हैं। पूजापाठ एवं जनकार्य करने वाले दूसरी श्रेणी के व्यक्ति रजनी तथा आकाश मार्ग से होते हुए पुन: पृथ्वी पर लौट आते हैं और इसी नक्षत्र में जन्म लेते हैं। श्राद्ध कर्म से मृतकों को सहायता मिलती है तथा वह सद्गति प्राप्त कर लेते हैं।