जानिए श्री गणेश को आखिर क्यों चढ़ाई जाती है दूर्वा :

हर देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा विधि तथा पूजा सामग्रियां अलग-अलग तरह की होती हैं। वहीं हिंदू धर्म में श्री गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। किसी भी शुभ कार्य के शुभारंभ और धार्मिक- मांगलिक कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की ही पूजा की जाती है।

श्री गणेश की पूजा में दूर्वा (घास) जरूर चढ़ाई जाती है।
आखिर दूर्वा (घास) में ऐसा क्या हैं ? आइये यहां जानते है –

एक पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक अनलासुर नाम का एक दैत्य हुआ करता था। अनलासुर का आतंक चारों तरफ फैला हुआ था। इस दैत्य के आतंक से सारे देवी-देवता बहुत ही परेशान हो गए थे। कोई भी देवता इस राक्षस को नही मार पा रहे थे। तब सभी देवता अनलासुर के आतंक से त्रस्त होकर श्री गणेश की शरण में गए। तब श्री गणेश ने अनलासुर को निगल लिया था।
अनलासुर को निगलने के कारण भगवान गणेश के पेट में बहुत जलन होने लगी थी। उनकी इस जलन को शांत करने के लिए मुनियों ने उन्हें खाने के लिए दूर्वा घास दे दी। इसे खाते ही श्री गणेश के पेट की जलन शांत हो गई। तभी से श्री गणेश की पूजा में उन्हें दूर्वा चढ़ायी जाने लगी।

ये है दूर्वा चढ़ाने के कुछ नियम

इस माना जाता है कि भगवान गणेश की पूजा-आराधना में दूर्वा चढ़ाने से सभी तरह के सुख और संपदा में वृद्धि होती है। पूजा में दूर्वा का जोड़ा बनाकर भगवान को चढ़ाया जाता है। दूर्वा घास के 11 जोड़ों को श्री गणेश को चढ़ाना चाहिए। दूर्वा ( घास ) चढ़ाने के लिए किसी साफ जगह से ही दूर्वा घास को तोड़ना चाहिए। गंदी जगहों से कभी भी दूर्वा घास को नहीं तोड़ना चाहिए।

दूर्वा चढ़ाते समय भगवान गणेश के 11 मंत्रों का जाप करना चाहिए।

ऊँ गं गणपतेय नम: ।
ऊँ गणाधिपाय नमः ।
ऊँ उमापुत्राय नमः ।
ऊँ विघ्ननाशनाय नमः ।
ऊँ विनायकाय नमः ।
ऊँ ईशपुत्राय नमः ।
ऊँ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ।
ऊँ एकदन्ताय नमः ।
ऊँ इभवक्त्राय नमः ।
ऊँ मूषकवाहनाय नमः ।
ऊँ कुमारगुरवे नमः ।