जानिए क्यों बांस की लकड़ी पर नहीं जलाई जाती चिता; क्या है ऐसा करने का कारण..!!!

हमारे शास्त्रों में बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित है। किसी भी हवन अथवा पूजन विधि में बांस को नही जलाते हैं। जैसा की आप जानते ही है जीवन से मृत्यु तक हिन्दू धर्म में सोलह संस्कार होते हैं और इसमे से मृत्यु को अंतिम संस्कार के रुप में मनाया जाता है। मृत्यु संस्कार कार्यों में लाश को रखने के

बांस की लकड़ी
बांस की लकड़ी

लिए “अर्थी”  में तो इस लकड़ी को प्रयोग किया जाता है लेकिन जलाते समय उसे हटा दिया जाता है। लाश भारी होती है, इसके अलावा बांस की पतली कमानियों से शैय्या तैयार करना भी आसान होता है, इसलिए अर्थी में इसका इस्तेमाल किया जाता है  लेकिन जलाने की मनाही है। लेकिन क्या आपको

पता ऐसा क्यों किया जाता है ऐसा क्यों कि अर्थी में इस्तेमाल होने के बाद भी चिता में क्यों नहीं जलाई जाती बांस की लकड़ी ?क्यों शव का अंतिम संस्कार करते समय बांस की लकड़ी को चिता पर नहीं रखते है।

तो आइये आज जानते ऐसा क्यों किया जाता है क्या है इसके पीछे के धार्मिक और वैज्ञानिक मान्यता:

जलती हुई चिता
जलती हुई चिता

शास्त्रों में भी वृक्षों की रक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। पेड़-पौधों की विशेष रूप से पूजा की जाती है लेकिन बांस की लकड़ी को जलाना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना भारी पितृ दोष माना जाता है, इसलिए अर्थी में इस्तेमाल होने वाली बांस की लकड़ी को नही जलाया जाता है।वैज्ञानिक नजरिए से

बांस की लकड़ी में लेड सहित कई और धातु मौजूद होते है जिसके जलने पर लेड ऑक्साइड बनता है। इससे न सिर्फ वातावरण दूषित होता बल्कि सांस संबंधित कई परेशानियां भी आती है इसलिए शवों के साथ बांस की लकड़ी को नही जलाया जाता है।