अनंत चतुर्दशी : आखिर क्यों मनाते हैं अनंत चतुर्दशी, जानिए व्रत कथा !!

अनंत चतुर्दशी पर विष्णु भगवान के अनंत अवतारों का पूजन किया जाता है। इस वजह से इसे अनंत चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति को अनेकों गुना ज्यादा शुभ फलों की प्राप्ति होती है। इस बार अनंत चतुर्दशी 1 सितंबर 2020 को मनाई जा रही है। तो आइए जानते हैं कि क्यों मनाते हैं अनंत चतुर्दशी, क्या है इसकी व्रत कथा :

अनंत चतुर्दशी व्रत सर्वप्रथम पांडवों द्वारा रखा गया था। जिसके बारे में कथा मिलती है। जब दुर्योदधन पांडवों से मिलने गया तब माया महल का दृश्य देखकर धोखा खा गया। माया के कारण भूमि मानो जल के समान प्रतीत हो रही थी तथा जल भूमि के समान दुर्योधन ने भूमि को जल समझ कर अपने वस्त्र ऊपर कर लिए परंतु जल को भूमि समझ कर वह तालब में गिर गया। इस पर द्रोपदी ने उपहास करते हुए ऐसा कहा “अंधे का पुत्र अंधा” इसी बात का प्रतिशोध लेने के लिए दुर्योधन ने अपने मामा शकुनी के साथ मिलकर षडयंत्र रचा, और पांडवों को जुए में पराजित करके भरी सभा में द्रोपदी का अपमान कर दिया।

पांडवों को बारह वर्ष का वनवास तथा एक वर्ष अज्ञात वास मिला, अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करते हुए पांडव अनेक कष्टों को सहते हुए वन में रहने लगे। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से इस दुख को दूर करने का उपाय पूछा इस पर कृष्ण जी ने युधिष्ठिर से कहा कि जुआ खेलने के कारण लक्ष्मी तुमसे रुष्ट हो गई हैं, तुम अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री विष्णु का व्रत रखो। इससे तुम्हारा राज-पाठ वापस मिल जाएगा। तब इस व्रत का महत्व बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई।
अनंत चतुर्दशी की व्रत कथा :
बहुत समय पहले एक तपस्वी ब्राह्मण था जिसका नाम सुमंत तथा पत्नी का नाम दीक्षा था। उनकी सुशीला नाम की एक सुंदर एवं धर्मपरायण कन्या थी। जब सुशीला कुछ बड़ी हुई तब उसकी मां दीक्षा की मृत्यु हो गई। तब उनके पिता सुमंत ने कर्कशा नाम की स्त्री से विवाह करा। जब सुमंत ने अपनी पुत्री का विवाह ऋषि कौंडिण्य के साथ ककर दिया तो कर्कशा ने विदाई में अपने जवांई को ईंट और पत्थर के टुकड़े बांध कर दे दिए। ऋषि कौडिण्य को ये व्यवहार अत्यंत बुरा लगा, वे दुखी मन के साथ अपनी सुशीला को विदा कराकर अपने साथ लेकर चले गए , चलते-चलते रात का समय हो गया।

तब सुशीला ने देखा कि संध्या के समय नदी के तट पर सुंदर वस्त्र धारण करके स्त्रियां किसी देवता का पूजा कर रही हैं। सुशीला ने उनसे पूछा तो उन्होंने अनंत व्रत की महत्ता सुनाई, तब सुशीला ने भी यह व्रत किया और पूजन करके चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिण्य के पास आकर सारी बात बताई। ऋषि ने उस धागे को तोड़ कर अग्नि में डाला। इससे अनंत भगवान का अपमान हुआ। ऋषि कौंडिण्य परिणामस्वरुप दुखी रहने लगे। उनकी सारसम्पत्ति नष्ट हो गई तथा वे दरिद्र हो गए।
एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने दुख का कारण बताते हुए ऐसा कहा कि आपने अनंत भगवान का डोरा जलाया है। इसके पश्चाद ऋषि कौंडिण्य को बहुत पश्चाताप हुआ, वे अनंत डोरे को प्राप्त करने के लिए वन चले गए। वन में कई दिनों तक ऐसे ही भटकने के पश्चाद वे एक दिन भूमि पर गिर पड़े। तब अनंत भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि तुमने मेरा अपमान किया, जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा, परंतु अब तुमने पश्चाताप कर लिया है, मैं प्रसन्न हूं तुम घर जाकर अनंत व्रत को विधि पूर्वक करो। चौदह साल तक व्रत करने से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जांएगे, और तुम दोबारा संपन्न हो जाओगे। ऋषि कौंडिण्य ने विधि पूर्वक व्रत किया तथा उन्हें सारें कष्टों से मुक्ति प्राप्त हुई।